✍️ विकास यादव
अमेरिका में पढ़ाई कर रहे सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन ने इन छात्रों पर हमास का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए उनके एफ-1 वीजा (स्टूडेंट वीजा) रद्द कर दिए हैं। इस कार्रवाई में कई भारतीय छात्र भी शामिल हैं, जिनके भविष्य पर अब अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। मार्च 2025 के आखिरी हफ्ते में अचानक भेजे गए ई-मेल ने छात्रों को सकते में डाल दिया है, जिसमें उन्हें तत्काल देश छोड़ने या सख्त कानूनी कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी दी गई है।
ई-मेल से शुरू हुआ संकट
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से भेजे गए इस ई-मेल में साफ कहा गया है कि छात्रों के वीजा को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जा रहा है। कारण? कैंपस एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनकी गतिविधियां। खबरों के मुताबिक, जिन छात्रों ने कैंपस में इजराइल-विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया या सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट्स को लाइक, शेयर या कमेंट किया, उन्हें निशाना बनाया गया है। हैरानी की बात यह है कि कुछ छात्रों का कहना है कि वे प्रदर्शनों का हिस्सा नहीं थे, फिर भी उनकी ऑनलाइन मौजूदगी उनके लिए मुसीबत बन गई।
ई-मेल में छात्रों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे रद्द किए गए वीजा का इस्तेमाल न करें और जल्द से जल्द अमेरिका छोड़ दें। ऐसा न करने पर उन्हें इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) की ओर से जबरन डिपोर्टेशन का सामना करना पड़ सकता है। यह खबर उन छात्रों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है, जो अपने करियर और सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका पहुंचे थे।
हमास समर्थन का आरोप और AI का खेल
अमेरिकी प्रशासन ने इस कार्रवाई के पीछे एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया है। ‘कैच एंड रिवोक’ नामक एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्रोग्राम के जरिए छात्रों की सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रखी गई। इस प्रोग्राम ने उन छात्रों को चिह्नित किया, जिन्होंने कथित तौर पर हमास या अन्य आतंकी संगठनों के समर्थन में पोस्ट्स किए या उनसे सहमति जताई। अमेरिकी सरकार का दावा है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
खास बात यह है कि यह कार्रवाई सिर्फ कैंपस में प्रदर्शन करने वालों तक सीमित नहीं रही। अगर किसी छात्र ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लाइक की या ट्विटर पर कोई कमेंट किया, तो वह भी इस दायरे में आ गया। भारतीय छात्रों में से कई का कहना है कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनकी कौन सी हरकत को ‘हमास समर्थन’ माना गया।
भारतीय छात्रों पर असर
2023-24 के ओपन डोर्स रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में 11 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों में से 3.31 लाख भारतीय हैं। इनमें से कितने छात्र इस कार्रवाई की चपेट में आए, इसका सटीक आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है। लेकिन यह साफ है कि भारतीय छात्रों की एक बड़ी संख्या प्रभावित हुई है। इनमें से कई छात्र अपने परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाए हुए हैं, जिन्होंने मोटी फीस और कर्ज लेकर उन्हें विदेश भेजा था। अब अचानक वीजा रद्द होने से उनके सपने अधर में लटक गए हैं।
विवाद और सवाल
इस कार्रवाई ने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या सोशल मीडिया पर एक लाइक या कमेंट को आतंकी समर्थन माना जा सकता है? क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है? अमेरिकी विश्वविद्यालयों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की आलोचना शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यह छात्रों के अधिकारों का हनन है और इससे अकादमिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन इसे अपनी ‘कठोर इमिग्रेशन नीति’ का हिस्सा बता रहा है।
आगे क्या?
छात्रों के पास अब दो रास्ते हैं- या तो वे ‘सेल्फ डिपोर्ट’ करें, यानी खुद अमेरिका छोड़ दें, या फिर कानूनी लड़ाई लड़ें। लेकिन वीजा रद्द होने के बाद दोबारा अमेरिका लौटने की राह आसान नहीं होगी। उन्हें नया वीजा लेना होगा, जिसकी प्रक्रिया में उनकी पिछली गतिविधियां आड़े आ सकती हैं। भारतीय छात्रों के लिए यह एक चेतावनी भी है कि विदेश में पढ़ाई के दौरान उनकी हर ऑनलाइन और ऑफलाइन गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है।
यह घटना न केवल छात्रों के लिए, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों के लिए भी एक नया मोड़ ला सकती है। क्या यह कार्रवाई उचित है या यह सिर्फ एक सख्त नीति का अतिरेक है? यह सवाल अभी अनुत्तरित है, लेकिन एक बात तय है- अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले छात्रों के लिए अब यह राह पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है।