नई दिल्ली, 5 अप्रैल, 2025, शनिवार। भारत में नक्सली हिंसा के खिलाफ चल रही जंग में पिछले छह वर्षों में शानदार कामयाबी देखने को मिली है। आंकड़े बताते हैं कि देश में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से जुड़ी घटनाओं में 25% की कमी आई है। जहां 2019 में नक्सली हिंसा की 501 घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 374 रह गई। इसी तरह, इस हिंसा में मरने वालों की तादाद 202 से घटकर 150 हो गई, जो 26% की गिरावट को दर्शाती है। प्रभावित जिलों की संख्या भी 2018 में 90 से कम होकर अप्रैल 2024 तक 38 पर आ गई। महाराष्ट्र जैसे राज्य में तो यह बदलाव और भी साफ दिखता है, जहां 2019 में 48 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2024 में घटकर महज 10 रह गईं। यह आंकड़े न सिर्फ सरकार की रणनीति की सफलता को उजागर करते हैं, बल्कि देश में शांति और विकास की नई उम्मीद भी जगाते हैं।
नक्सलवाद का घटता दायरा
एक समय था जब नक्सली हिंसा का खौफ देश के कई हिस्सों में छाया रहता था। मध्य और पूर्वी भारत का “रेड कॉरिडोर” नक्सलियों के प्रभाव का पर्याय बन चुका था। लेकिन बीते कुछ सालों में यह तस्वीर बदल रही है। प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी इसका सबूत है। 2018 में जहां 90 जिले नक्सलवाद की चपेट में थे, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 38 पर आ गया है। महाराष्ट्र में हिंसा की घटनाओं में 79% की कमी आई है, जो बताती है कि नक्सलियों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। यह सिर्फ संख्याओं की जीत नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक नई सुबह की शुरुआत है, जो लंबे समय से हिंसा और अशांति की छाया में जी रहे थे।
सरकार की दोहरी रणनीति: सुरक्षा और विकास
नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने सुरक्षा और विकास के दोहरे हथियारों का इस्तेमाल किया है। सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई, पुलिस बलों का आधुनिकीकरण किया गया, और खुफिया जानकारी को साझा करने की व्यवस्था को मजबूत किया गया। इसके साथ ही, नक्सल प्रभावित इलाकों में किलेबंदी वाले पुलिस थानों का निर्माण तेजी से हुआ, ताकि सुरक्षा बलों की मौजूदगी को और प्रभावी बनाया जा सके। हथियारों और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता ने भी नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशनों को मजबूती दी।
लेकिन सरकार का फोकस सिर्फ सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की बयार भी पहुंचाई गई। सड़कें, स्कूल, अस्पताल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को इन इलाकों तक ले जाया गया, ताकि लोगों का भरोसा सरकार पर बढ़े और नक्सलियों के प्रति उनका समर्थन कम हो। यह रणनीति कारगर साबित हुई, क्योंकि हिंसा में कमी के साथ-साथ इन क्षेत्रों में शांति की बहाली भी दिख रही है।
चुनौतियां अभी बाकी
हालांकि यह सफलता उत्साहजनक है, लेकिन नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने की राह में अभी कुछ चुनौतियां बाकी हैं। घने जंगलों और दुर्गम इलाकों में नक्सलियों की मौजूदगी अब भी सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बनी हुई है। इसके अलावा, सामाजिक-आर्थिक असमानता और विकास का अभाव जैसे मूल कारणों को दूर करना भी जरूरी है, जो नक्सलवाद को पनपने का मौका देते हैं। सरकार की कोशिश है कि 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह उखाड़ फेंका जाए, और इसके लिए सुरक्षा बलों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों का सहयोग भी अहम होगा।
एक नया भारत
नक्सली हिंसा में कमी न सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह देश के विकास के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है। प्रभावित इलाकों में शांति की बहाली से वहां निवेश, रोजगार और समृद्धि का रास्ता खुलेगा। महाराष्ट्र से लेकर छत्तीसगढ़ तक, नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अब अपने अंतिम चरण में दिख रही है। सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के सहयोग से वह दिन दूर नहीं, जब “रेड कॉरिडोर” का नाम इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा और इन क्षेत्रों में सिर्फ विकास की कहानी लिखी जाएगी।
नक्सलवाद के खिलाफ यह जीत सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि लाखों लोगों के बेहतर भविष्य की जीत है। यह एक ऐसे भारत की नींव रख रही है, जहां हिंसा की जगह शांति और अशांति की जगह समृद्धि होगी।