वाराणसी, 2 अप्रैल 2025, बुधवार। काशी की पावन गंगा के तट पर, राजेंद्र प्रसाद घाट की सीढ़ियों पर बने ओपन थिएटर में एक बार फिर महामूर्ख मेले का रंगारंग आयोजन हुआ। गंगा घाटों की सीढ़ियों पर उमड़ी भारी भीड़ के बीच यह मेला अपनी अनूठी पहचान के साथ सबको हंसने-गुदगुदाने और सोचने पर मजबूर कर गया। सबसे रोचक बात यह है कि इस आयोजन में एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी हिस्सा लेते हैं, लेकिन नाम है इसका “महामूर्ख मेला”। काशीवासियों के लिए यह मेला सिर्फ हंसी-ठिठोली का मौका नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा का हिस्सा है जो जीवन के गहरे मायनों को भी उजागर करती है।
लड़का बना दुल्हन, लड़की बनी दूल्हा: शादी का अनोखा नाटक
इस मेले की सबसे मजेदार परंपरा है शादी का अनोखा खेल। यहां दुल्हन की भूमिका में लड़का और दूल्हे की जगह लड़की होती है, जबकि पंडित की कुर्सी पर कवि बैठता है, जो अपनी अगड़म-बगड़म शायरी के साथ शादी की रस्में पूरी करता है। और हां, यह शादी शुरू होते ही टूट भी जाती है! इस बार यह परंपरा निभाने के लिए शहर के मशहूर डॉक्टर शिवशक्ति प्रसाद द्विवेदी दुल्हन बने, तो उनकी पत्नी और जानी-मानी डॉ. नेहा द्विवेदी ने दूल्हे की भूमिका निभाई। बंगाली रीति-रिवाज का मुकुट पहनकर डॉ. नेहा बारात लेकर पहुंचीं, और भीड़ ने तालियों के साथ इस अनोखे जोड़े का स्वागत किया।
कवियों की महफिल और साइबर क्राइम पर पुलिस का पक्ष
शादी के इस नाटक के बाद कवियों की महफिल सजी। बनारस, उत्तर प्रदेश और देश के कोने-कोने से आए कवियों ने अपनी शायरी और व्यंग्य के तीरों से माहौल को हंसी के ठहाकों से भर दिया। हर कविता, हर पंक्ति में ऐसा जादू था कि लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। इसी बीच उत्तर प्रदेश पुलिस और साइबर क्राइम पुलिस के प्रतिनिधियों ने भी मंच संभाला। उन्होंने साइबर ठगी के शिकार हुए लोगों को जागरूक करते हुए बताया कि कैसे वे दोबारा “मूर्ख” बनने से बच सकते हैं। यह संदेश हंसी के साथ-साथ एक गंभीर चेतावनी भी लेकर आया।
मंत्री से लेकर चिकित्सक तक बने दूल्हा-दुल्हन
महामूर्ख मेले की शुरुआत 1969 में दशाश्वमेध घाट पर एक बजड़े से हुई थी। उस वक्त यूपी के राज्यपाल सर होमी मोदी के बेटे सांसद पीलू मोदी को दूल्हा और काशी के रईस महेंद्र शाह को दुल्हन बनाया गया था। तब से लेकर अब तक इस मेले में कई बड़े नाम शामिल हो चुके हैं। मंत्री, सांसद, विधायक और चिकित्सक जैसे लोग दूल्हा-दुल्हन की भूमिका में नजर आ चुके हैं। मेले के पहले संयोजक पं. धर्मशील चतुर्वेदी थे, और उनके निधन के बाद सांड़ बनारसी और दमदार बनारसी ने इस परंपरा को बखूबी संभाला है।
पांच बार बदली जगह, पर नहीं बदला अंदाज
संयोजक दमदार बनारसी बताते हैं कि 56 सालों में महामूर्ख मेले की जगह भले ही पांच बार बदली हो, लेकिन इसका कलेवर आज भी वही है। बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के काशी की जनता डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट के मुक्ताकाशी मंच पर जुटती है। 1971 में यह मेला दशाश्वमेध घाट से भद्दोमल की कोठी में शिफ्ट हुआ, लेकिन वहां भीड़ कम रही। दस साल तक चले आयोजन के बाद दो साल तक चौक थाना परिसर में यह हुआ। फिर 1983 से 1985 तक नागरी नाटक मंडली इसका ठिकाना बनी। आखिरकार 1986 में यह मेला राजेंद्र प्रसाद घाट पर आया, और पिछले 38 सालों से यहीं अनवरत चल रहा है।
हंसी और परंपरा का अनमोल तोहफा
महामूर्ख मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की संस्कृति और हास्य का अनमोल तोहफा है। यह मेला हमें हंसना सिखाता है, सोचना सिखाता है और सबसे बढ़कर यह याद दिलाता है कि जिंदगी में मूर्खता और बुद्धिमानी का अपना-अपना स्थान है। गंगा के किनारे हर साल यह मेला एक नई कहानी, नया रंग और नया जोश लेकर आता है, जो काशीवासियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा।