✍️ विकास यादव
नई दिल्ली, 2 अप्रैल 2025, बुधवार। उत्तराखंड की सियासत इन दिनों गर्म है। बीजेपी की सरकार पर अवैध खनन का मुद्दा भारी पड़ता दिख रहा है। विपक्षी कांग्रेस इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब पता चला कि यह हथियार कांग्रेस को बीजेपी के ही एक सिपाही ने थमा दिया। नाम है त्रिवेंद्र सिंह रावत—हरिद्वार से सांसद और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री। उन्होंने अपनी ही सरकार को संसद में कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल यह है कि आखिर त्रिवेंद्र को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इसके पीछे कोई पुरानी कड़वाहट है या फिर सियासी खेल का नया दांव? आइए, इसकी परतें खोलते हैं।
संसद में बम: अवैध खनन का मुद्दा
28 मार्च को लोकसभा में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जोरदार तरीके से अवैध खनन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उधम सिंह नगर जैसे जिलों में रात के अंधेरे में खनन माफिया सक्रिय हैं। यह न सिर्फ पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि कानून-व्यवस्था को भी ठेंगा दिखा रहा है। सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद माफिया पर लगाम नहीं लग रही। सड़क हादसों में बेकसूरों की जान जा रही है। रावत का यह बयान बीजेपी के लिए असहज करने वाला था, क्योंकि यह उनकी अपनी सरकार की नाकामी को उजागर कर रहा था।
पुराना हिसाब-किताब?
यह पहली बार नहीं है जब त्रिवेंद्र ने पार्टी को मुश्किल में डाला हो। 2021 में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से उनके बयानों ने कई बार बीजेपी की नींद उड़ाई है। मिसाल के तौर पर, नवंबर 2022 में उन्होंने देहरादून स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पर तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि उनके कार्यकाल में यह प्रोजेक्ट 99वें से 9वें स्थान पर पहुंच गया था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि स्मार्ट सिटी का सपना धुंधला पड़ता दिख रहा है। इस बयान के बाद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को दिल्ली दौड़ लगानी पड़ी थी। रावत से पार्टी फोरम में बात रखने की गुजारिश की गई, लेकिन वे अपनी राह पर अड़े रहे।
क्या यह सब 2021 की उस टीस का नतीजा है, जब उन्हें सीएम की कुर्सी से हटाया गया था? पॉलिटिकल एक्सपर्ट एवं हिन्दुस्तान अखबार के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मिश्र कहते हैं कि राज्य में बीजेपी का पूरा दबदबा है—सभी सांसद, ज्यादातर मेयर उनके पास हैं। फिर भी रावत का संसद में अपनी ही सरकार पर हमला करना पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह को साफ दिखाता है।
कुर्सी का खेल और बदलते चेहरे
त्रिवेंद्र सिंह रावत 2017 में मुख्यमंत्री बने थे, जब बीजेपी ने राज्य में शानदार वापसी की थी। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले उन्हें हटा दिया गया। उनकी जगह तीरथ सिंह रावत आए, जो चार महीने भी कुर्सी नहीं संभाल पाए। फिर पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंपी गई। धामी के नेतृत्व में बीजेपी ने सत्ता बरकरार रखी, लेकिन वे खुद खटीमा सीट हार गए। इसके पीछे भी पार्टी की गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराया गया।
जमीन का कानून और नई सियासत
त्रिवेंद्र के कार्यकाल में एक और बड़ा विवाद हुआ था। 2018 में उन्होंने निवेशकों के लिए जमीन खरीद की सीमा 12.5 एकड़ से बढ़ाकर 30 एकड़ कर दी थी। इसके लिए पुराने कानून में बदलाव किया गया, जिसे लेकर राज्य में खूब हंगामा मचा। 2022 के चुनाव में धामी ने इसे पलटने का वादा किया और फरवरी 2025 में इसे अमल में लाया। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मिश्र कहते हैं कि इस फैसले ने त्रिवेंद्र को नाराज कर दिया। अवैध खनन का ताजा मुद्दा उन्हें धामी से हिसाब बराबर करने का मौका दे गया।
धामी का बढ़ता कद
6 मार्च को पीएम नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड दौरे पर धामी की तारीफ की। उन्हें “छोटा भाई” और “ऊर्जावान मुख्यमंत्री” कहकर संबोधित किया। पीएम ने उनकी पीठ भी थपथपाई। यूनिफॉर्म सिविल कोड और हिंदुत्व के मुद्दों पर धामी की मुखरता को केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन मिल रहा है। शुरू में संगठन पर कमजोर पकड़ के बावजूद, धामी अब अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं। यह त्रिवेंद्र को नागवार गुजर रहा है, जिनकी नजर भी सीएम की कुर्सी पर टिकी है।
क्षेत्रीय समीकरण और नाराजगी
उत्तराखंड की राजनीति में ठाकुर-ब्राह्मण और कुमाऊं-गढ़वाल का खेल पुराना है। बीजेपी ने इस बार कुमाऊं से आने वाले धामी को चुना, जबकि त्रिवेंद्र गढ़वाल से हैं। अरविंद मिश्र कहते हैं कि गढ़वाली होने के नाते त्रिवेंद्र खुद को सीएम पद का हकदार मानते होंगे। उनकी नाराजगी का यह भी एक कारण हो सकता है।
सफाई और सवाल
संसद में हमले के बाद उठे सवालों पर त्रिवेंद्र ने सफाई दी। उन्होंने कहा, “मैं अपनी सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहता। मुझे सीएम नहीं बनना, मैं अब दिल्ली की सियासत में हूं।” लेकिन हरिद्वार में गंगा किनारे होने वाला अवैध खनन उनके लिए बड़ा मुद्दा है। वहां खनन माफिया सक्रिय हैं, और इसको लेकर आंदोलन भी होते रहे हैं। मातृ सदन जैसे संगठन लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें दो संन्यासियों की जान जा चुकी है।
गुटबाजी का इतिहास
बीजेपी में गुटबाजी कोई नई बात नहीं। 2007 से 2012 तक खंडूरी और निशंक के बीच कुर्सी का खेल चला। 2017 के बाद भी पांच साल में तीन सीएम बदले। त्रिवेंद्र का ताजा बयान भी इसी गुटबाजी की कड़ी माना जा रहा है।
उत्तराखंड की सियासी पेचीदगी: त्रिवेंद्र के हमले से धामी की कुर्सी पर संकट?
उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार मजबूत है, लेकिन अंदरूनी तनाव कम नहीं। त्रिवेंद्र सिंह रावत का अपनी ही सरकार पर हमला सियासी रंजिश और पुराने हिसाब का मिश्रण लगता है। क्या यह धामी को चुनौती है या अपनी ताकत दिखाने की कोशिश? यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि पहाड़ की सियासत में अभी कई मोड़ बाकी हैं।