नई दिल्ली, 2 अप्रैल 2025, बुधवार। दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। दिल्ली सरकार में मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता कपिल मिश्रा के खिलाफ 2020 के दिल्ली दंगों में कथित भूमिका को लेकर FIR दर्ज करने का आदेश जारी किया गया है। कोर्ट ने न सिर्फ FIR का निर्देश दिया, बल्कि दिल्ली पुलिस को इस मामले में आगे की जांच करने के लिए भी कहा है। यह मामला तब और रोचक हो गया, जब पता चला कि दिल्ली पुलिस ने इस FIR का पुरजोर विरोध किया था, यह दावा करते हुए कि कपिल मिश्रा को “फंसाने की साजिश” रची गई है। तो आखिर क्या है इस पूरे मामले की कहानी? चलिए, इसे रोचक अंदाज में समझते हैं।
दंगों की आग और कपिल मिश्रा का नाम
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। इन दंगों में 53 लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। उस वक्त नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन चरम पर थे, और इसी बीच हिंसा भड़क उठी थी। इस मामले में कपिल मिश्रा का नाम तब से चर्चा में है, जब उन पर आरोप लगा कि उनके एक कथित भड़काऊ भाषण ने हिंसा को हवा दी। हालांकि, मिश्रा और उनके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं।
अब, पांच साल बाद, यमुना विहार के रहने वाले मोहम्मद इलियास ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इलियास ने अपनी याचिका में दावा किया कि 23 फरवरी 2020 को उन्होंने कपिल मिश्रा और उनके साथियों को कर्दमपुरी इलाके में सड़क जाम करते और रेहड़ी-पटरी वालों की गाड़ियों को तोड़ते देखा। इतना ही नहीं, इलियास का कहना है कि उस वक्त दिल्ली पुलिस के बड़े अधिकारी, जिसमें तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे, मिश्रा के साथ खड़े थे, और मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों को धमकी दी कि अगर सड़क खाली नहीं हुई, तो “अंजाम भुगतने” पड़ेंगे।
कोर्ट का फैसला: “जांच जरूरी है”
राउज़ एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने इस मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस द्वारा पेश की गई सामग्री से यह साफ है कि कपिल मिश्रा उस वक्त घटनास्थल पर मौजूद थे। जज ने इसे “प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध” माना और कहा, “इसकी गहराई से जांच जरूरी है।” कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को FIR दर्ज करने और मामले की तह तक जाने का आदेश दिया। यह फैसला 1 अप्रैल 2025 को सुनाया गया, और अब पुलिस को 16 अप्रैल तक अपनी अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी है।
दिल्ली पुलिस का विरोध: “साजिश” का दावा
दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली पुलिस ने इस FIR का कड़ा विरोध किया। पुलिस का कहना था कि कपिल मिश्रा को जानबूझकर फंसाने की कोशिश की जा रही है। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कोर्ट में दलील दी कि दंगों की “बड़ी साजिश” में मिश्रा की भूमिका की जांच पहले ही हो चुकी है, और कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला। पुलिस ने यह भी कहा कि दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (DPSG) की चैट्स से पता चलता है कि चक्का जाम की योजना पहले से बनाई गई थी, और मिश्रा को हिंसा का “मास्टरमाइंड” दिखाने की कोशिश की गई। लेकिन कोर्ट ने पुलिस के इस तर्क को दरकिनार कर जांच का रास्ता साफ कर दिया।
सियासी घमासान: AAP की मांग- “गिरफ्तारी और इस्तीफा”
इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) ने मौके को भुनाने में देर नहीं की। AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पूरी दिल्ली ने देखा कि कपिल मिश्रा ने दंगे भड़काए। कोर्ट के आदेश के बाद अब उन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना चाहिए और पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करना चाहिए।” AAP का दावा है कि वीडियो सबूतों में मिश्रा को डीसीपी के साथ खड़े होकर “नफरत भरा भाषण” देते देखा गया, जिसके बाद हिंसा शुरू हुई। दूसरी ओर, बीजेपी ने अभी इस मामले पर खुलकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी अपने नेता के बचाव में उतरेगी।
आगे क्या?
यह मामला अब न सिर्फ कानूनी, बल्कि सियासी जंग का मैदान बन गया है। कपिल मिश्रा, जो कभी AAP का हिस्सा थे और बाद में बीजेपी में शामिल होकर दिल्ली सरकार में मंत्री बने, एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। कोर्ट का यह आदेश दिल्ली दंगों की उस कड़वी याद को फिर से ताजा कर रहा है, जिसने राजधानी को दहला दिया था। क्या यह जांच मिश्रा की भूमिका को साबित करेगी, या पुलिस के “साजिश” वाले दावे को मजबूती देगी? यह तो वक्त ही बताएगा।
फिलहाल, दिल्ली की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, इस फैसले की गूंज सुनाई दे रही है। हर नजर अब दिल्ली पुलिस की अगली चाल और इस जांच के नतीजों पर टिकी है। क्या सच सामने आएगा, या यह एक और अनसुलझा अध्याय बनकर रह जाएगा? कहानी अभी बाकी है, दोस्तों!