नई दिल्ली, 5 नवंबर 2024, मंगलवार: उत्तर प्रदेश में मदरसे दीनी तालीम के साथ चलते रहेंगे। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जिसमें उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें मदरसा शिक्षा ऐक्ट 2004 को असंवैधानिक बताया गया था। इस फैसले से उत्तर प्रदेश के 16 हजार मदरसों में पढ़ने वाले 17 लाख छात्रों के भविष्य पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मदरसा शिक्षा ऐक्ट 2004 धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यकों की शिक्षा के अधिकार को बरकरार रखा जाना चाहिए और मदरसा एक्ट मदरसों के कामकाज में दखल नहीं है ¹। इसके अलावा, कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह मदरसों के लिए न्यूनतम मानक तय कर सकती है और यह देख सकती है कि मदरसों में किस तरह की शिक्षा दी जाए।
ये है पूरा मामला:
साल 2004 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसा ऐक्ट बनाया, जिसमें यह कहा गया कि सभी मदरसे सरकार के नियमों के अधीन होंगे। इस ऐक्ट के तहत, यूपी में साढ़े 24 हजार मदरसों में से आठ हजार रजिस्टर्ड नहीं हैं, जबकि बचे साढ़े 16 हजार मदरसे रजिस्टर्ड हैं और सरकारी नियमों के अनुसार चलते हैं। इनमें से 560 मदरसे ऐसे हैं जो राज्य सरकार के फंड से चलते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मदरसों की शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं? राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने मदरसों की शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि मदरसे उचित शिक्षा के लिए अनुपयुक्त हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे स्कूलों में औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत दिए जाने वाले लाभों से भी वंचित हैं। इसके अलावा, मदरसों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के दायरे से छूट दी गई है, जिससे वहां पढ़ने वाले बच्चे न केवल स्कूलों में औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं, बल्कि मध्याह्न भोजन, वर्दी, प्रशिक्षित शिक्षक आदि जैसे लाभों से भी वंचित हैं।
मदरसों का तर्क क्या था?
मदरसों का तर्क बहुत मजबूत था। उनका कहना था कि वे 1908 से ही चल रहे हैं और उत्तर प्रदेश में साढ़े 16 हजार मदरसे हैं, जिनमें 17 लाख छात्र पढ़ रहे हैं और 10 हजार शिक्षक हैं। उनका सवाल था कि अगर मदरसे खत्म हो जाएंगे, तो दीनी तालीम कैसे देंगे? मदरसे सरकार के आदेश के तहत चल रहे हैं और उनके सिलेबस को मदरसों में लागू किया जा रहा है। मदरसों का मानना था कि वे अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को शिक्षा देने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं और उनके बंद होने से समुदाय को बहुत नुकसान होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मदरसे न केवल धार्मिक शिक्षा देते हैं, बल्कि वे बच्चों को सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की भी शिक्षा देते हैं। इसलिए, मदरसों ने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मजबूत तर्क दिए और सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा:
सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा एक्ट मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि मदरसा बोर्ड और राज्य सरकार के पास शिक्षा के मानक तय करने की पर्याप्त शक्तियां हैं। सरकार मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए नियमन कर सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मदरसा अधिनियम मदरसों के दिन-प्रतिदिन के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता है, बल्कि इसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना है। यह राज्य के सकारात्मक दायित्व के अनुरूप है, जो यह सुनिश्चित करता है कि छात्र उत्तीर्ण होकर सभ्य जीवन जिएं। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने मदरसों की शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए सरकार को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आदेश दिया है।
मदरसा एक्ट को रद्द किये जाने फैसले के खिलाफ ये पहुंचे थे कोर्ट
मदरसा एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार है। राज्य सरकार की मंजूरी से मदरसा बोर्ड यह सुनिश्चित करने के लिए नियम बना सकता है कि धार्मिक अल्पसंख्यक शिक्षाएं उचित मानकों की धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करें। इस मामले में अंजुम कादरी, मदारिस अरबिया के मैनेजर्स एसोसिएशन, ऑल इंडिया टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया, मैनेजर एसोसिएशन अरबी मदरसा नई बाजार और टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया कानपुर ने याचिकाएं दायर की थीं। ये याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थीं जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा अधिनियम 2004 को असंवैधानिक करार दिया गया था।
इलाहबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 22 मार्च को मदरसा एक्ट को असंवैधानिक करार दिया था। हाई कोर्ट ने सरकारी अनुदान पर मदरसा चलाने को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ माना था। हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि राज्य सरकार सभी मदरसा छात्रों का दाखिला राज्य सरकार सामान्य स्कूलों में करवाए। 5 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारडीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच ने बाद में विस्तार से मामले पर सुनवाई की और 22 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मदरसा संचालकों का कहना था कि इससे 17 लाख मदरसा छात्र और 10 हजार शिक्षक प्रभावित होंगे।