म्यांमार ने शुक्रवार को एक 14 वर्षीय रोहिंग्या लड़की को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जब उसे मणिपुर में असम पुलिस की एक टीम द्वारा निर्वासन के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ले जाया गया। अधिकारियों ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि केंद्र की मंजूरी के बाद, लड़की को असम के सिल्चर से गुरुवार को मणिपुर के मोरेह में अंतरराष्ट्रीय चेक-गेट पर ले जाया गया। हालांकि, म्यांमार के इमिग्रेशन अधिकारियों ने उसे यह कहते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि कोविड -19 महामारी के कारण चेक-गेट पिछले एक साल से बंद है।

इसके अलावा, म्यांमार के पुलिस अधिकारियों ने भारतीय अधिकारियों से कहा कि फिलहाल उनके देश की स्थिति भी किसी भी प्रकार के निर्वासन के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके बाद पुलिस की टीम लड़की को लेकर सिलचर लौट आई और उसे उसी शेल्टर होम को वापस सौंप दिया जहां वह पहले से रह रही थी।

अधिकारियों ने बताया कि लड़की दो साल पहले कछार जिले के सिलचर के रोंगपुर इलाके में एक घर में अचेत अवस्था में मिली थी।बाद में पता चला कि उसके माता-पिता बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में एक शरणार्थी शिविर में थे।

क्योंकि वह लड़की नाबालिग थी, इसलिए उसे डिटेंसन सेंटर में भेजने के बजाय पहले उजाला आश्रय केंद्र में रखा गया और उसके बाद निबेदिता नारी संगठन द्वारा चलाए जा रहे एक घर में लड़की शरण ही गई।

उजाला संस्था की पूजा दास अशरगी ने बताया कि जब उसे दो साल पहले शेल्टर होम में लाया गया था, तो उसे कोई भी भारतीय भाषा नहीं पता थी। उन्होंने कहा कि लड़की एक साल तक वहां रही, फिर उसने पढ़ाई और स्थानीय भाषा बोलना सीखा। इसके बाद उसे निबेदिता नारी संस्था के महिला घर भेज दिया गया।

निबेदिता नारी संगठन की प्रमुख दिब्या रॉय ने कहा कि उन्होंने लड़की को म्यांमार में उसके घर लौटने के लिए कदम उठाने को लेकर केंद्र सरकार को पिछले कुछ महीनों में कई पत्र लिखे हैं, जिसके लिए हाल ही में मंजूरी दी गई थी।

By anita

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