मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 लोगों और उनके हितों की रक्षा के लिए है। यह लोगों को कष्ट देने के लिए नहीं बना है। इसको लेकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। इसका विरोध करने वाले इस विधेयक को गौर से पहले पढ़ लें। बिना पढ़े अफवाह फैलायी जा रही है। 

मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि बीएमपी का नाम बदलकर बिहार सशस्त्र पुलिस किया गया है। बिहार मिलिट्री पुलिस, यह नामकरण उपयोगी नहीं है। पुलिस का जो काम है, वही वह करेगी। गलत करने वाले पुलिस को सजा देने का जिक्र भी इस विधेयक में है। अपराध नियंत्रण के लिए यह विधेयक लाया गया है। बोधगया सुरक्षा के लिए भी हमने बीएमपी बहाल किया। कोई सुरक्षा के लिए गया है और वहां अगर कोई गोली चलाएगा तो पुलिस कोर्ट की अनुमति का इंतजार करेगी या अपराधी को गिरफ्तार कर थाना के हवाले करेगी। किसी को काम सौंपेंगे तो अधिकार तो देंगे ही। आश्चर्य है कि इसके बारे में गलतफहमी पैदा की गई। आखिर किसने समझाया। बोधगया में महोबोधि मंदिर के पास कैसी घटना 2013 में घटी थी। किस तरह से वह बचा था। हमलोग तुरंत सुबह में जाकर एक-एक चीज को देखे। उसके बाद वहां की सुरक्षा के लिए बीएमपी को लगाया गया। दरभंगा एयरपोर्ट पर इन्हें कार्य सौंपा गया है। 

सीएम ने कहा कि डीजीपी व गृह के अपर मुख्य सचिव को कहा था कि इस प्रकार का दुष्प्रचार कौन कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं  कि आप ही के बीच रहने वाला कोई लोगों को गुमराह तो नहीं कर रहा है? जिसे यह अच्छा नहीं लग रहा है। अधिकारियों को इस विधेयक के बारे में प्रेस के सामने पूरी चर्चा करनी चाहिए थी। बताना चाहिए था कि आखिर क्या काम किया जा रहा है। अगर ऐसा हुआ होता तो कोई गुमराह नहीं कर सकता था। गलत करने पर सामान्य पुलिस पर से ज्यादा कार्रवाई की बात इस विधेयक में है। यह भी जान लीजिए। दूसरे राज्यों में जो इसका कानून है, उससे अलग नहीं है यह।  

काले कानून के विरोध पर विधायकों को पीटा गया: तेजस्वी
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने विस घेराव में लाठीचार्ज व विधानसभा में हुए घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है। आरोप लगाया कि सरकारी बर्बरता अंग्रेजी शासन की याद दिलाती है। विधानसभा में काला कानून पेश किया गया। विपक्ष इस जनविरोधी कानून का विरोध कर रहा था। आरोप लगाया कि विधायकों को पीटा गया व महिला विधाकों को बाल पकड़कर खींचा गया। सरकार विपक्ष और जनता की आवाज को दबा देना चाहती है। 

उन्होंने कहा कि सीआरपीसी में पुलिस को पहले ही बहुत पावर है तो अलग से यह कानून बनाने की जरूरत क्या है। आरोप लगाया कि पुलिस को गुंडा और रंगदार बनाने की कोशिश की जा रही है। जब विधेयक आया तब पुलिस ने विधायकों को घसीटकर पीटा। कानून बनने के बाद आम लोगों की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोहिया ने कहा था कि सड़कें सूनी हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है। कहा कि हम लोहिया के अनुयायी हैं, दमनकारी नीतियों से डरने वाले नहीं है। उन्होंने कहा कि काले कानूनों का सदन से सड़क तक विरोध जारी रहेगा।

हंगामा करने वालों पर होगी कार्रवाई : विधानसभा अध्यक्ष
विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने विपक्षी सदस्यों के आचरण की घोर निंदा की है। सभा की कार्यवाही समाप्त करने के पहले अपने संबोधन में कहा कि वे सदस्यों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे। कहा कि विपक्ष ने अभूतपूर्व हिंसक व्यवहार किया। यह घोर निंदनीय है। आसन इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। विशेषकर राजद का अपरिपक्व नेतृत्व ने जिस तरह से व्यवहार किया, वह आज तक नहीं हुआ। वह शोभनीय नहीं है।  जिस तरह से सदन को नहीं चलने देने की कोशिश की गई, वह निंदनीय है। इस तरह का हिंसक व्यवहार कभी नहीं हुआ। अध्यक्षीय कक्ष के तीनों दरवाजों को जिस तरह से आलमारी लगाकर, रस्सी बांधकर व धरना पर बैठकर बंद किया गया, उसे लगा कि विपक्ष के निशाने पर अध्यक्ष हैं। विपक्ष की यह कार्रवाई अच्छी नहीं कही जा सकती। सभाध्यक्ष ने कहा कि साल 2010 में भी राजद ने सदन में रातभर धरना दिया था, लेकिन उस समय परिपक्व नेतृत्व था। इसलिए ऐसी हिंसक स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी। आज अपरिपक्व नेतृत्व रहने के कारण सर्वोच्च सदन को कुरूक्षेत्र बनाने की कोशिश की गई। अगर अन्य सत्तापक्ष के सदस्यों ने धैर्य का परिचय नहीं दिया होता तो न जाने क्या होता। आसन ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं करेगा और इस पर समुचित निर्णय लिया जाएगा।  

विपक्ष के आचरण से सदन हुआ शर्मसार
संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि विधानसभा में जो दुर्घटना हुई, उसने सदन को शर्मसार कर दिया है। ऐसा लग रहा था मानों सब कुछ पूर्व नियोजित तरीके से हो रहा हो। जिस तरह से अध्यक्षीय कार्यालय का घेराव किया गया, सदन नहीं चलने देने की कोशिश हुई, इससे यह साफ भी होता है। चार दशक के संसदीय जीवन में हमने ऐसी घटना कभी नहीं देखी। जननायक कर्पूरी ठाकुर भी प्रतिपक्ष के नेता थे। वे भी धरना पर बैठे थे। उनको भी बाहर किया गया था। वह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी। सदन में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन जिस तरीके से आसन और सदन की मर्यादा को तार-तार किया गया, वह कहां तक जायज है। इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए यह जरूरी है कि कार्रवाई हो। आसन की ओर से जो भी निर्णय लिया जाएगा, वह पूरे सदन को मान्य होगा। 

By anita

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