वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी के प्रति देश के विश्‍वास के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत को भी जाता है। खास तौर से पार्टी के अंत्योदय संगठन को। यह वो संगठन है, जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्‍यक्ति की समस्‍याओं का हल करने के लिए बना है। दरअसल इस संगठन को बनाने के पीछे सुप्रसिद्ध विचारक एवं चिंतक दीनदयाल उपाध्याय की सोच है। आज पं. दीन दयाल उपाध्‍याय की पुण्‍य तिथि है। उन्‍हीं ने ही देश को अंत्‍योदय का सही मतलब सिखाया। अंत्योदय यानि समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति का कल्याण।

नीति निर्धारण में समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति के कल्याण का दर्शन दीनदयाल जी ने 1950 के दशक में दिया। वे कहा करते थे कि सरकार में बैठे नीति-निर्माताओं को कोई भी नीति बनाते समय यह विचार करना चाहिए कि यह नीति समाज के अंतिम व्यक्ति यानि सबसे गरीब व्यक्ति का क्या भला करेगी? इसी मंत्र का पालन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार कर रही है।

हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दीनदयाल उपाध्याय अध्ययन पीठ के अध्यक्ष डॉ.अरुण कुमार लिखते हैं कि ‘अंत्योदय’ दीनदयाल जी के अन्तःकरण की आवाज थी। इसका प्रमुख कारण था उनके द्वारा बचपन से ही गरीबी और अभाव को झेलना। ढाई साल की आयु में पिता का साया उठ गया और सात साल की आयु में माता भी चल बसीं। माता-पिता की छत्रछाया से वंचित होकर बचपन से ही वे रिश्तेदारों के आश्रय में शिक्षा के लिए भटकते रहे। नाना के पास गये तो दस साल की आयु में नाना का भी निधन हो गया। उसके बाद मामा के घर गये तो 15 साल की आयु में मामी का निधन हो गया। 18वें साल में छोटे भाई का मोतीझरा के कारण निधन हो गया। जब दसवीं पास की तो एकमात्र सहारा नानी भी चल बसीं। बाद में ममेरी बहन के पास रहने लगे तो एम.ए. की पढ़ाई करते हुए बहन का भी निधन हो गया और इस कारण एम.ए. फाइनल की परीक्षा नहीं दे सके।

राष्ट्रश्रम ही राष्ट्रधर्म

डॉ. अरुण कुमार लिखते हैं कि दीनदयाल जी का आर्थिक चिंतन केवल किताबी और मध्यमवर्ग की विलासिता के उपकरण तैयार करने तक सीमिति नहीं था। जनसंघ की स्थापना के तुरंत बाद उनके आर्थिक चिंतन का निचोड़ उनकी पुस्तक ‘भारतीय अर्थनीतिः विकास की एक दिशा’ में सामने आया है, जिसमें उनकी प्रमुख चिंता यह है कि ‘हर हाथ को काम’ और ‘हर खेत को पानी’ कैसे मिले। न्यूनतम मानवीय आवश्यकता के सिद्धांत को उन्होंने अपनी जीवन शैली में भी प्रत्यक्ष उतारा। कार, वातानुकूलित कक्ष और कंप्यूटरों की कृत्रिम दुनिया से अलग हटकर समाज के अंतिम व्यक्ति की जिंदगी के नजदीक पहुंचना उनका लक्ष्य था। दीनदयाल जी का अंत्योदय राष्ट्रीय श्रम से प्रेरित था।

अंत्योदयी योजक

दीनदयाल जी मानते थे कि समष्टि जीवन का कोई भी अंगोपांग, समुदाय या व्यक्ति पीड़ित रहता है तो वह समग्र यानि विराट पुरुष को विकलांग करता है। इसलिए सांगोपांग समाज-जीवन की आवश्यक शर्त है अंत्योदय। मनुष्य की एकात्मता तब आहत हो जाती है जब उसका कोई घटक समग्रता से पृथक पड़ जाता है। इसलिए समाज के योजकों को अंत्योदयी होना चाहिए। दीनदयाल जी ने एकात्म मानव के अंत्योदय दर्शन को अपने व्यवहार में जीया।

1956 में विंध्यप्रदेश जनसंघ प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में दीनदयालजी के निर्देश पर 1956 में हीरा खदान मालिकों के विषय में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया। उस प्रस्ताव में कहा गया, “कार्यसमिति ने पन्ना-हीरा खदान जांच समिति की रिपोर्ट पर संतोष व्यक्त किया। समिति ने कहा कि जनसंघ उक्त जांच समिति द्वारा सुझाए गये इस प्रस्ताव से कि सरकार और जनता दोनों के सहयोग से एक स्वतंत्र निगम बनाया जाए, के पक्ष में है। कार्यसमिति ने हीरा खदानों के लीज होल्डरों को मुआवजा देने का तीव्र विरोध किया और कहा कि उन लीज होल्डरों ने मिनरल कंसेशन रूल की धारा 48 व 51 का उल्लंघन किया है। अतः धारा 53 के अनुसार उनकी लीज जब्त होनी चाहिए।”

अल्प रोजगार भी बेकारी समान

आज विश्व की जनसंख्या करीब 7.8 अरब है, जिसमें करीब 60 करोड़ आबादी (2019 में) वंचित है। आज दुनिया में करीब 82 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। भारत में यह संख्या करीब 20 करोड़ है। मनुष्यों के अलावा दुनिया में पशु-पक्षी और कीट-पतंग भी हैं। उनकी भी तो चिंता करनी होगी। इसलिए वैश्वीकरण और केन्द्रीयकरण जैसी बातें तब तक स्वीकार्य नहीं हो सकती जब तक विश्व में एक भी व्यक्ति वंचित है। दीनदयाल जी अंत्योदय के लिए लोकतंत्र को आवश्यक मानते हैं क्योंकि इससे राजनीति में समाज के अंतिम व्यक्ति की सहभागिता का आश्वासन मिलता है। इसी प्रकार वे आर्थिक लोकतंत्र को भी परम आवश्यक मानते हैं। वे कहते हैं, ‘प्रत्येक को वोट जैसे राजनीतिक प्रजातंत्र का निकष है, वैसे ही प्रत्येक को काम आर्थिक प्रजातंत्र का मापदंड है।

दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन जहां समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति के कल्याण की बात करता है वहीं प्रत्येक क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी प्रेरित करता है। उनका चिंतन देश और समाज के समग्र विकास की गीता है।

By anita

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